नेपाल में माआ॓वादियों के लहराते परचम ने कई दिग्गजों को ढेर कर दिया है। संविधान सभा चुनाव परिणामों ने जहां माआ॓वादियों के लिए सत्ता का रास्ता साफ कर दिया है वहीं नेपाल अब नया इतिहास रचने जा रहा है।

कदम दर कदम

  • माआ॓वादियों ने राजशाही को खात्मा करने के लिए हथियारों का सहारा लिया। करीब एक दशक तक संघर्ष किया।

  • चुनी हुई संविधान सभा को दो साल में नेपाल का नया संविधान लिखना है। जरूरत पड़ने पर इसका कार्यकाल छह महीनें तक बढ़ाया जा सकता है।

  • नेपाल की राजधानी में भी 15 में 7 सीटें मिलने से जाहिर हो गया है कि सुदूर इलाकों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी माआ॓वादियों ने बढ़िया पकड़ बना रखी थी।

  • चुनाव में 240 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव और 335 सीटों के लिए समानुपातिक पद्धति से चुनाव हुआ है। इन चुनाओं में मतदाताओं को पार्टी को चुनना था न कि उम्मीदवारों को।

कठिन है डगर

  • ऐसा माना जाता है कि प्रचंड एक दुस्साहिक नेता हैं। स्टेट्समैन के रूप में दिखाई पड़ने के लिए उन्हें समय लग सकता है।

  • दो साल पहले तक माआ॓वादी एक खास वर्ग का नेतृत्व कर रहे थे। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह हर तबके के साथ हैं।

  • प्रचंड के आलोचकों का मानना है कि उनको सब्र नहीं आता। पार्टी के अंदर ही कई मुद्दों पर बिखराव इतना ज्यादा है कि उन्हें संभालनें में ही प्रचंड की तमाम ऊर्जा जाया होगी।

माआ॓वादी क्यों?

  • माआ॓वादियों ने अपने संघर्ष के जरिए लोगों के बीच अपनी जगह बनाई, जिसका फायदा उन्हें मिला।

  • तमाम मुद्दों पर जहां बार्की पार्टियों ने ढुलमुल रास्ता अख्तियार किया था, माआ॓वादियों का एजेंडा दो टूक था।

  • पहले सत्ता में रह चुकी पार्टियों ने अपने फायदे के लिए इस दल से उस दल में जो उछलकूद मचा रखी थी उससे जनता का मोहभंग था।

प्रमुख पार्टियां

  1. नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (माआ॓वादी)

  2. नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (यूएमएल)

  3. नेपाल कांग्रेस

  4. मधेशी जनांदोलन फोरम

  5. नेपाल मजदूर किसान पार्टी

माआ॓वादी

जब पूरी दुनिया में रिवोल्यूशनरी कम्यूनिज्म लगभग समाप्त हो रहा था उसी समय नेपाल में यह मजबूत होता गया। नेपाल में माआ॓वादियों की खासी संख्या है। इनके हथियारबंद दस्तों का दबदबा नेपाल के तमाम इलाकों में फैलता गया। 1996 में छोटे-छोटे टुकड़ों में लामबंद ये विद्रोही इतने शक्तिशाली होते गए कि नेपाल में राजवंश से लोहा लेने लायक बने। हालांकि इनकी सुगबुगाहट को 1990 के बाद से समझा जाने लगा था।

भारत-नेपाल

नेपाल की भारत से निकटता दुनिया के कुछ देशों को खासी अखरती रही है। दुनिया के तमाम मंचों में भारत ने अपने आप को कभी अकेला नहीं पाया। नेपाल के लोगों का भारत में और भारत के लोगों का नेपाल में बस जाना एक आम बात रहा है। लोक संगीत, भाषा और संस्कृति के तमाम अन्य पहलुओं में दोनों की साझा संस्कृति तो रही ही हैं दोनो देशों के मूल्यों में भी जबरदस्त समन्वय रहा है।

  • 57 हजार वर्ग मील में बसे इस भू-भाग की आबादी 2 करोड़ 70 लाख है।

  • दुनिया की सबसे ऊंची चोटी मांउट एवरेस्ट नेपाल में ही है।

  • पर्यटन यहां की आय का प्रमुख श्रोत रहा है।

प्रस्तुति : अरविंद खरे


नेपाल में लाल परचम

पडोसी नेपाल का राजनीतिक क्षितिज मतपेटियों से निकले परिणामों के कारण लाल रंग में सराबोर होता दिख रहा है। यह दक्षिण एशिया के साथ पूरी दुनिया के लिए एक नई स्थिति है। हालांकि पूरा नेपाल माआ॓वादियों के लाल रंग में एकाकार नहीं हुआ है, मधेस ने इनके उभार की गति पर ब्रेक लगा दिया, लेकिन संविधान सभा में सबसे शक्तिशाली दल के रूप में उभरने के बाद देश की नियति तय करने में इनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी। जिस प्रकार का राजनीतिक परिश्य उभर रहा है उसमें नेपाल से राजशाही को किसी रूप में कायम रखने की जो झीनी संभावनाएं किसी कोने से दिख रहीं थीं, उनका अंत हो गया है। माआ॓वादियों ने गणतंत्र का ही वायदा किया था, मार्क्सवादी राज्य का नहीं। संविधान सभा चुनाव के पूर्व अंतरिम सरकार, सभी राजनीतिक दलों के समर्थन से राजशाही के अंत एवं पूर्ण लोकशाही का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। इससे संविधान सभा के भविष्य की दिशा निर्धारित हो चुकी है। 601 सदस्यीय संविधान सभा के परिणामों का एक संदेश सभी दलों के बीच आपसी तालमेल एवं समन्वय का है। एक ऐसे देश में, जहां राजनीतिक रूपांतरण को लेकर विचार भिाता हो, किसी दल का बहुमत न होने की स्थिति में आपसी समझ-बूझ कायम करना कठिन है। चुनाव के दौरान ही सीपीएन एमाले एवं माआ॓वादियों के बीच जिस प्रकार का तीखा टकराव हुआ है उसको पाटना आसान नहीं है। हिसा और खून के भयावह दौर से बाहर निकलते नेपाल में अगर राजनीतिक दलों के बीच ईमानदार सहकार और साहचर्य नहीं होता है तो हिमालय की वादियां फिर थर्रा सकती हैं। इसलिए समय का तकाजा है कि नेपाल के सभी दल जनता के फैसले का सम्मान करते हुए मिलजुल कर नेपाल का भविष्य तय करें। सबसे बडा दल होने के कारण सर्वप्रमुख जिम्मेवारी माआ॓वादियों की ही है। मधेसी नेताओं के साथ हुए समझौते के बाद देश का संघीय ढांचा एवं स्वायत्ता मधेस राज्य के गठन का दायित्व भी संविधान सभा को पूरा करना है। यह संतोष का विषय है कि माआ॓वादी नेता प्रचंड ने सभी दलों के साथ मिलजुलकर काम करने की इच्छा व्यक्त की है। भारत के साथ माआ॓वादियों की प्रमुखता वाले राजनीतिक प्रतिष्ठान के साथ संबंध बनाकर द्विपक्षीय हितों पर आगे बढ़ने में कोई समस्या होनी नहीं चाहिए। वैसे भी नेपाली कांग्रेस एवं एमाले की बहुत बुरी स्थिति हुई है। इनके ज्यादातर प्रमुख नेता पराजित हो चुके हैं। इसमें दो राय नहीं कि चुनाव में माआ॓वादियों ने भारत विरोधी उग्र प्रचार किया था, कितु प्रचंड ने भारत एवं चीन दोनों के साथ बेहतर संबंधों की बात की है। उन्हें भी अपने देश की भौगोलिक, राजनीतिक बनावट के साथ सांस्कृतिक अविच्छिता का आभास तो होगा ही।


नेपाल के माआ॓वादियों ने उदाहरण पेश किया

आसनसोल (एजेंसी)। माकपा के पोलितब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा है कि नेपाल में माआ॓वादियों ने सत्ता में आने के लिए लोकतंत्र की राह चुन कर भारत में अपने समकक्षों के सामने एक उदाहरण पेश किया है।

हालांकि येचुरी ने पार्टी की युवा शाखा की तीन दिवसीय बैठक के समापन पर संवाददाताओं से यह भी कहा कि नेपाल के माआ॓वादियों और भारत में उनके समकक्षों के बीच अंतर है। उन्होंने कहा कि नेपाल के माआ॓वादियों ने हथियार त्याग कर चुनावों में भागीदारी की जबकि भारत में उनके समकक्ष बेकसूर लोगों को मार रहे हैं। अगर उनको सद्बुद्धि आ जाए और भारत में लोग उन्हें स्वीकार कर लें तो वामपंथी इसका स्वागत करेंगे। यह पूछे जाने पर कि क्या माकपा अमेरिका के साथ परमाणु करार पर अपना रूख बदल चुकी है ? येचुरी ने कहा कि हमने कुछ शर्तें रखी हैं और जब तक उन्हें पूरा नहीं किया जाता, हमारा रूख बदलने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि संप्रग सरकार के साथ परमाणु करार को लेकर चल रहे मतभेदों का अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हम भाजपा के नेतृत्व वाली सांप्रदायिक ताकतों का मुकाबला करने के लिए ही कांग्रेस नीत संप्रग को समर्थन दे रहे हैं। लेकिन हम तीसरे विकल्प के लिए भी प्रयासरत हैं। येचुरी ने कहा कि प्रतिक्रियावादी ताकतें वाम दलों को श्रेयहीन करने के लिए हमेशा सक्रिय रहती हैं। इसका ताजा उदाहरण नंदीग्राम और सिंगुर हैं, जहां वाम मोर्चा सरकार विकास एवं परिवर्तन करना चाहती है।

डिजाईनिंग : सुरेन्द्र देशवाल