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कोटा को हां, क्रीमीलेयर को ना केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (आरक्षण) कानून, 2006 को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी
न्यायालय की आ॓र से केंद्रीय शिक्षण संस्थान (दाखिले में आरक्षण) अधिनियम 2006 को हरी झंडी मिल जाने से आईआईटी, आईआईएम और अन्य केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में 2008-09 के शैक्षणिक सत्र में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण प्रदान करने का रास्ता साफ हो गया। आज के फैसले से उच्च शिक्षण संस्थानों में अब 49.5 फीसदी आरक्षण हो जाएगा। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता में न्यायालय की पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने एक सर्वसम्मत फैसले में कहा कि सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े तबके से ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखा जाना चाहिए। साथ ही हर पांच साल के बाद आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए। पीठ ने 93 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2005 की वैधता को बरकरार रखा। इससे केंद्र उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण प्रदान करने के लिए विशेष कानून लाने में सक्षम हो सकेगा। पीठ के सदस्यों ने चार अलग-अलग फैसले दिए लेकिन उनमें इस बात पर आम सहमति थी कि 93 वां संविधान संशोधन और आरक्षण प्रदान करने के लिए 2006 का कानून ‘संविधान के मूलभूत ढांचे का उल्लंघन नहीं है।’ गैर सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थानों में 93 वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को लेकर सिर्फ अलग-अलग राय थी। चार न्यायाधीशों ने मुद्दे को खुला छोड़ दिया क्योंकि इस तरह की किसी भी संस्था ने न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया था। हालांकि न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी ने कहा-‘‘गैर सहायता प्राप्त संस्थानों पर आरक्षण थोपना उस मूलभूत ढांचे का उल्लंघन होगा जो संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत किसी नागरिक को आजीविका के लिए कोई भी पेशा अपनाने की छूट देता है।’’ न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी ने अपने फैसले में वर्तमान सांसदों एवं विधायकों तथा पूर्व सांसदों एवं विधायकों के बच्चे को आ॓बीसी आरक्षण के लाभ से बाहर रखने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि सामाजिक तथा शैक्षणिक तौर पर पिछड़े तबके की पहचान के मानदंडों को लागू करने के दौरान आठ सितम्बर 1993 के आफिस मेमोरेंडम के अनुसार संवैधानिक पदों को धारण करने वाले और सरकारी अधिकारियों के बच्चों को क्रीमी लेयर से बाहर किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति बालकृष्णन ने कहा-‘‘याचिकाकर्ता की वे दलीलें कानूनन स्वीकार्य नहीं हैं कि यह कानून वोट हासिल करने के लिए समुदाय के एक तबके को खुश करने की मंशा से है। इसे सिर्फ खारिज किया जाना चाहिए।’’ न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत ने कहा कि केंद्र को आ॓बीसी उम्मीदवारों के लिए कट आफ अंक निर्धारित करने की वांछनीयता का परीक्षण करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा-‘‘पिछड़े वर्ग की पहचान सिर्फ जाति के आधार पर नहीं की जाती। पिछड़े वर्ग की पहचान के लिए अन्य मानदंडों का भी पालन किया जाता है। इस कारण से अधिनियम अवैध नहीं है। न्यायमूर्ति बालकृष्णन ने कहा-‘‘पिछड़े वर्ग का निर्धारण सिर्फ जाति के आधार पर नहीं किया जा सकता। गरीबी, सामाजिक पिछड़ेपन और आर्थिक पिछड़ेपन ये सभी पिछड़ेपन निर्धारण की अन्य कसौटियां हैं।’’ इस नजरिए से न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन भी सहमत थे। इसी मुद्दे पर न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति सीके ठक्कर ने कहा कि पिछड़ा वर्ग का निर्धारण क्रीमी लेयर को बाहर निकाल कर किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक आंकड़ा निश्चित तौर पर केंद्र और राज्य सरकार से प्राप्त किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति पसायत ने कहा-‘‘जहां तक पिछड़े वर्ग के निर्धारण का संबंध है, केंद्र सरकार को एक अधिसूचना जारी करनी चाहिए। गलत रूप से शामिल और बाहर किए जाने के आधार पर ऐसी अधिसूचना को चुनौती दी। क्रीमीलेयर में कौन संवैधानिक पद- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के जज, चुनाव आयुक्त, यूपीएसएसी के अध्यक्ष और सदस्य व राज्यों के लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष व सदस्य, सीएजी और ऐसे ही संवैधानिक पदों पर कार्यरत लोगों के बच्चों को आरक्षण नहीं मिलेगा। नौकरी पेशा श्रेणी :
(मंडल कमीशन लागू करते हुए सरकार ने 8 सितम्बर, 1993 को क्रीमी लेयर को परिभाषित किया था।)
आरक्षण को मूर्खतापूर्ण और देश के लिए घातक मानते थे नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ थे और उन्होंने नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था को दोयम दर्जे की आ॓र ले जाने वाला बताते हुए उसे मूर्खतापूर्ण नहीं बल्कि घातक करार दिया था। प्रख्यात पत्रकार और भाजपा नेता अरूण शौरी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक में पंडित नेहरू का 27 जून 1961 को लिखा गया पत्र प्रकाशित किया गया है जो उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजा था। श्री शौरी की पुस्तक ‘आरक्षण का दंश’ के अनुसार पं नेहरू ने पत्र में लिखा था, ‘हम अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सहायता उपलब्ध कराने से संबंधित कुछ नियमों और मान्यताओं से तंग आ चुके हैं। उन्हें सहायता की आवश्यकता है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण के पक्ष में नहीं हूं, विशेषकर नौकरियों में। मैं ऐसी किसी भी व्यवस्था के खिलाफ हूं जो हमें अकुशल और दोयम दर्जे की आ॓र ले जाए।’ पं नेहरू ने कहा, ‘जब हम दोयम दर्जे की आ॓र ले जाने वाली किसी भी व्यवस्था को बढ़ावा देना शुरू कर देंगे तो हम अपना सब कुछ खो बैठेंगे।’ पंडित नेहरू के इन उद्गार को भाजपा नेता द्वारा अपनी पुस्तक में ऐसे समय में पेश करना महत्वपूर्ण है जब कल ही उच्चतम न्यायालय ने शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण संबंधी कानून लागू करने का रास्ता साफ किया है और कांग्रेस एवं भाजपा दोनों ने ही इस फैसले का स्वागत किया है। (एजेंसी)
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संकलन एवं डिजाईनिंग : सुरेन्द्र कुमार देशवाल |