केंद्रीय आयोजना का क्षेत्रवार परिव्यय सेंसेक्स पर बजट का प्रभाव बजट का सार कहां से आता है और कहां जाता है रूपया

बढ़ी वोट की प्यास, आम जन हुआ खास

दस्तक देते चुनावों की आहट को पहचान कठोर निर्णय लेने वाले वित्त मंत्री सांता क्लाज की भूमिका में नजर आए। गठबंधन सरकार की मजबूरियों से भली भांति वाकिफ वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने संसद में अपना आठवां बजट पेश करते समय समाज के हर तबके को उपहार बांटे। कृषि पर निर्भर देश की दो तिहाई आबादी को खुश कर इसके वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए उन्होंने किसानों के 60 हजार करोड़ रूपए के कर्जे माफ करने की घोषणा की।

सबसे अहम आम आदमी को राहत देने के लिए व्यक्तिगत आयकर छूट की सीमा को एक लाख 10 हजार से बढ़ा कर 1 लाख पचास हजार कर दिया। आयकर की दरों को संशोधित करके भी उसे राहत प्रदान की गई है। उघोग जगत को खुश करने के लिए कुछ उत्पादों पर उत्पाद व सीमा शुल्क में छूट देने की भी घोषणा की। केंद्रीय बिक्री कर को तीन फीसद से घटाकर दो फीसद कर दिया तथा विवादास्पद बैंकिंग लेनदेन कर को समाप्त कर दिया। चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने वाले केंद्रीय कर्मचारियों को खुश करने के लिए वित्त मंत्री ने कहा कि छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट को इस साल मार्च तक आ जाएगी। शेयर बाजार में सट्टेबाजी व कृत्रिम रूप से बढ़ रही प्रोपर्टी की कीमतों को हतोत्साहित करने के लिए अल्पकालीन पूंजीगत लाभ पर लगने वाले कर की दर को दस फीसद से बढ़ाकर 15 फीसद कर दिया गया है।

छोटे किसानों के कर्जे हुए माफ, अन्य किसानों को भी राहत : वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने लघु और सीमांत किसानों को राहत देने के लिए उनके ऋण माफ किए जाने की घोषणा की। इस माफी में सरकारी बैंकों के साथ ग्रामीण क्षेत्रीय बैंकों द्वारा 31 मार्च 2007 तक दिए गए सभी कृषि ऋण शामिल होंगे। लघु और सीमांत किसानों के अतिरिक्त किसानों की कर्ज माफी के लिए दिसम्बर 2007 तक दिये गए ऋणों के एकमुश्त निपटान की योजना लायी जाएगी। इस स्कीम से तीन करोड़़ छोटे और सीमांत किसान और एक करोड़़ अन्य किसान लाभान्वित होंगे। इस योजना के तहत 50,000 करोड़़ रूपए के ऋण माफ किए जाएंगे। इनके अलावा 10,000 करोड़़ रूपए की और रियायतें किसानों को मिलेंगी।

बजट में ऋण माफी और रियायतों पर कुल 60,000 करोड़़ रूपए के खर्च का प्रावधान किया गया है। ऋण छूट और रियायत स्कीमों का कार्यान्वयन 30 जून 2008 तक पूरा होगा। ऋण माफी और रियायतों के बाद किसान नए कर्ज लेने के लिए स्वतंत्र होंगे। 2004–06 के दौरान दिए गए कृषि ऋणों की पुनर्रचना की जाएगी। इन ऋणों को भी छूट के दायरे में शामिल किया जाएगा।

स्वास्थ्य : वित्त मंत्री नें देश के लोगों की स्वास्थ्य की देखभाल के लिए 16,534 करोड़ रूपए का प्रावधान किया है। यह पिछले साल की तुलना में यह 15 प्रतिशत अधिक है। राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन के लिए भी पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक धनराशि आवंटित की गई है। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों के लिए 30 हजार रूपये का स्वास्थ्य सुरक्षा कवर देने का प्रस्ताव किया गया है। वित्त मंत्री नें छोटे और मझोले शहरों में स्वास्थ्य सुविधाए मुहैया कराने के लिए नए अस्पताल खोलने पर पांच सालों के लिए करों में रियायत देने का प्रस्ताव किया है।

कृषि और फार्म सेक्टर : इस वित्तीय वर्ष में कृषि की वृद्वि दर 2.6 प्रतिशत रही है। इस साल खाघान्नों का उत्पादन 219.32 मिलियन टन होगा जो एक रिकार्ड होगा। सरकार ने 25 हजार करोड़ रूपये के परिव्यय से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और 4882 करोड़ रूपये के परिव्यय से राष्ट्रीय खाघ सुरक्षा मिशन की शुरूआत की है। दोपहर का भोजन योजना विश्व का सबसे बड़ा स्कूली भोजन कार्यक्रम है। इसके अतंगर्त 11.4 करोड़ बच्चे लाभान्वित होंगे।

सारी चिंताओं पर भारी वोटों की चिंता

आलोक पुराणिक

बजट 2008 का भाषण देते हुए वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने एक महत्वपूर्ण बात कही है- हम बजट के आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, उनके परिणामों पर नहीं। चिदम्बरम की चिंता सही है पर वोटों की चिंता सारी चिंताओं पर भारी पड़ती है। यही वजह है कि अभी राष्ट्रीय गारंटी योजना के परफार्मेंस पर बहस चल ही रही है कि इसका दायरा बढ़ा दिया गया है और देश के 596 ग्रामीण जिलों को इसके दायये में लाया गया है।

किसानों के कर्ज की समस्या का मसला जिस तरह से 60000 करोड़ रूपये के कर्ज माफी के जरिये निपटाने की कोशिश की गयी है, उसे देखकर साफ होता है कि वास्तविक समस्या को समझने की कोशिश की ही नहीं गयी है। यह कर्ज माफी मूलत: बैंकों के जरिये होगी जबकि समस्या की असली जड़ निजी साहूकार हैं। निजी साहूकारों से कर्ज लेने वाले किसानों का कोई भला इस स्कीम से नहीं होगा। अगर इस समस्या को विस्तार से समझा जाता, तो इससे कम रकम में ज्यादा बेहतर परिणाम लाये जा सकते थे। विदर्भ, पंजाब में किसानों को परेशान करने वाले निजी साहूकार ज्यादा हैं।

दरअसल इस कदम से वास्तविक तौर से त्रस्त किसानों को तो कोई फायदा नहीं होगा, हां एक खास किस्म की वित्तीय गैरजिम्मेदारी सिस्टम में जरूर आ जाएगी। मंहगाई यूं तो सामने वाले दरवाजे से आ ही चुकी है, बल्कि आ ही रही है। सर्विस टैक्स को सरकार दुधारू गाय मानकर चल रही है। बजट ने इस काम को आगे ही बढ़ाया है।

सर्विस टैक्स मोबाइल बिल से लेकर, ड्राइक्लीनिंग के खर्च तक, कोचिंग फीस से लेकर स्टॉक बाजार के सौदों तक सब जगह सर्विस टैक्स विघमान है। अपना मोबाइल बिल गौर से देखिए, बिल के नीचे टोटल के आगे होगा- सर्विस टैक्स और एजुकेशन सेस। कुल मिलाकर यह बारह प्रतिशत से ऊपर पड़ता है। 112 रूपये के मोबाइल बिल में असल बिल 100 का है, 12 रूपये के आसपास की रकम बतौर सर्विस टैक्स के खाते में जा रही है।

सर्विस टैक्स से सरकार को बहुत उम्मीदें हैं। हर सरकार ने इसमें अपनी तरह से इजाफा किया है। 1 जुलाई 1994 को जब सर्विस टैक्स शुरू किया गया था, तब सिर्फ तीन सेवाएं इसके दायरे में थीं- टेलीफोन, स्टॉक ब्रोकर सेवाएं और जनरल इंश्योरेंस। बाद में इनकी संख्या बढ़ती चली गयी और अब तो यह आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते सेंचुरी के पार चला गया है।

1995-96 में इस मद में सरकार को कुल 862 करोड़ रूपये हासिल हुए थे। 2007-08 का टारगेट करीब 50,200 करोड़ रूपये का था। बाहर सालों में 862 करोड़ रूपये से बढ़कर सर्विस टैक्स 50,200 करोड़ रूपये के पार जाने के आसार हैं। 2006-07 में सर्विस टैक्स से करीब 37,000 करोड़ रूपये की उगाही हुई थी। यानी 2007-08 का टारगेट इसके पिछले साल के मुकाबले करीब 34 प्रतिशत से भी ज्यादा था। जब पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर करीब 9 प्रतिशत हो, तब 30 फीसद से ज्यादा की बढ़ोतरी की उम्मीद सर्विस टैक्स में यह बताती है कि सर्विस टैक्स किस हद तक दुधारू गाय के रूप में विकसित हो चुका है। मौटे तौर पर सर्विस टैक्स की बढ़ोतरी को अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के साथ जोड़कर देखा जा सकता है। अभी अर्थव्यवस्था का करीब 55 प्रतिशत सेवा क्षेत्र से आ रहा है। यानी उघोग और कृषि बहुत पीछे छूट गये हैं।

देश का सकल घरेलू उत्पाद करीब 42 लाख करोड़ रूपये का है। इसका आधा हिस्सा भी अगर सेवा क्षेत्र का माना जाए तो करीब 21 लाख करोड़ रूपये सेवा क्षेत्र के खाते में आते हैं। इसका बारह प्रतिशत भी टैक्स माना जाए तो करीब ढाई लाख करोड़ रूपये सर्विस टैक्स से वसूले जा सकते हंै। 2007-08 में भी इसकी सिर्फ बीस फीसद रकम सर्विस टैक्स से वसूले जाने का प्रस्ताव था। यानी सर्विस टैक्स में अब भी अपार संभावनाएं हैं। यहीं से सर्विस टैक्स के पेच शुरू होते हैं।

जिस तरह से आयकर संपन्न, ज्यादा संपन्न, बहुत ज्यादा संपन्न करदाता में अंतर करता है, वैसा अंतर सर्विस टैक्स नहीं करता। उत्पाद शुल्क, आयात शुल्क में वस्तु के आधार पर, उनके उपभोग के स्तर के आधार पर भेद किया जाता है। यही वजह है कि विदेशी शराब पर इंपोर्ट ड्यूटी ज्यादा होती है, देसी शराब पर टैक्स कम होते हैं। पर सर्विस टैक्स ऐसा कोई भेद नहीं करता। यहां सारे करदाता एक ही उस्तरे से काटे जाते हैं। सर्विस टैक्स सिर्फ एक ही दर यानी बाहर प्रतिशत की दर से काम करता है। जिसके मोबाइल का बिल एक हजार है, वो भी बारह प्रतिशत देगा। जिसके मोबाइल का बिल एक लाख है वह भी बारह प्रतिशत देगा। इस तरह से सर्विस टैक्स देने वाले की क्षमता के आधार पर कोई भेद नहीं करता।

इस तरह से सरकार के तमाम करों में यह मूलत: कर न्याय के सिद्धांत के विरोध में है। होना यह चाहिए कि सर्विस टैक्स देने वाले की क्षमता के हिसाब से लगे। यानी सुपर फाइव स्टार डीलक्स सूट का सर्विस टैक्स ज्यादा हो सकता है, छोटे बैंक्वेट हाल में शादी करने वाले पर कर का बोझ कम डाला जा सकता है। कारपोरेट कोचिंग सेंटरों पर सर्विस टैक्स ज्यादा हो सकता है, लघु कोचिंग सेंटरों पर सर्विस टैक्स कम हो सकता है।

इस आधार पर सर्विस टैक्स लगे, तो कुछ राहत कम आय वालों को हो सकती है। देर-सबेर सरकार को इस दृष्टिकोण से विचार करना होगा। सर्विस टैक्स का दायरा अब इतना व्यापक हो रहा है कि लगभग हर व्यक्ति इस दायरे में आ रहा है। वह आम आदमी भी जिसकी बात यूपीए सरकार और उसके सहयोगी लगातार करते हैं। एक ही उस्तरे में सबकी कटाई न्याय और कर के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। सर्विस टैक्स का दायरा अब इतना बड़ा हो गया है कि इन मुद्दों पर विचार किया जाना जरूरी है।

आर्थिक प्रश्नों का जवाब

वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के पिटारे से कोई ऐसा जिन्न बाहर नहीं आया जिसे देखकर लोग चमत्कृत या भयभीत हों। आर्थिक सुधारों के निकटदर्शी दोष वाले इसे चुनावी सड़क का लुभावना बजट कह सकते हैं। लेकिन चुनाव के कारण आम आदमी को लाभ पहुंचाने में कोई बुराई नहीं है। वस्तुत: लंबे समय बाद बजट से कल्याणकारी राज्य के चरित्र की झलक मिली है, फिर भी यह सुधारवादी कदमों पर समाजवादी छौंक या कल्याणकारी मुलम्मा भर नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था के सामने उपस्थित मूल प्रश्नों का इसके वर्तमान ढांचे एवं खुली प्रणाली की सीमाओं में हल ढूंढ़ने का प्रयास किया गया है। एक साथ महंगाई की सुरसा का मुंह बंद करने, विकास की मंद चाल को धक्का देने, खेती की बुझी रोशनी को उद्दीप्त करने, उत्पादन एवं बिक्री के चक्र को पटरी पर लाने, रोजगार बढाने, बचत और निवेश को संतुलित करने के उपाय किए गए हैं। मध्यम वर्ग के आयकरदाताओं को इतनी बड़ी छूट एक साथ कभी नहीं मिली, लेकिन जब कर अदायगी उम्मीद से बेहतर हो और उसमें भी प्रत्यक्ष कर तो फिर ऐसा करना लाजिमी था। कम कर, अधिक वसूली आधार के सिद्धांत का पालन किया गया है। अब 2 लाख तक के आमदनी वालों को 9 हजार रूपए की बचत होगी। इस बचत का असर सकल विकास पर पड़ेगा, क्योंकि शेष राशि ये अन्य सामग्रियों पर खर्च कर सकेंगे। कॉरपोरेट एवं पूंजी बाजार से विशेष छूट नहीं मिलने पर व्यक्त की जा रही निराशा अकारण है। सुधार के 17 वषा में हर बार रियायतें संभव नहीं हैं। शेयर बाजार में लघुकालीन लाभ पर कर 10 से बढाकर 15 प्रतिशत करने का सकारात्मक लाभ निवेशकों के भीतर लंबे समय के लिए निवेश करने की प्रवृत्ति बदलने के रूप में मिल सकता है। आलोचक भूल रहे हैं कि वित्ता मंत्री ने कोई नया कर नहीं लगाया। वे दीर्घकालीन लाभ से भी कर के रूप में बड़ी राशि झटक सकते थे। बैंकिग क्षेत्र के लिए नगद लेनदेन कर को 1 अप्रैल से समाप्त करने का निर्णय उघमियों की मांगों के अनुरूप है। औषधि उघोगों एवं मैन्यूफैक्चरिग क्षेत्र में सेनवेट तथा उत्पाद शुल्क में कटौती, जीवन रक्षक दवाइयों को कर मुक्त करने सहित ऐसे अनेक कदम हैं जिनसे इन दोनों क्षेत्रों को पोषक तत्व मिलेगा। बुनियादी ढांचे पर विस्तार से भले चर्चा नहीं है लेकिन यदि गांवों पर लगने वाले धन को देखा जाए तो गांव के सड़क, स्वास्थ्य सेवाएं, संचार, शुद्ध पेयजल, भवन योजना आदि बुनियादी सुविधाएं ही तो भूमिका निभाएंगे। शहरों एवं गांवों के बीच विकास में संतुलन स्थापित किए बगैर विकास दर स्थिर कैसे हो सकता है। ज्ञान महाशक्ति बनने एवं उसे आर्थिक संपाता का एक प्रमुख पहलू बनाने का पूरा दिग्दर्शन बजट में है। हालांकि महंगाई के बारे में ठोस कुछ नहीं है और यह चिता का विषय है।

संकलन एवं डिजाईनिंग : सुरेन्द्र देशवाल