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पार्टी
और विपक्ष
के साथ-साथ
आम आदमी भी
आपसे बहुत
ज्यादा
अपेक्षा कर
रहा है, इसे
किस रूप में
देखते हैं? |
यह मेरा
सौभाग्य है
कि हर तबका
मुझसे बड़ी
अपेक्षाएं
लगाए हैं।
उम्मीदों पर
कितना खरा
उतरता हूं
इसका
मूल्यांकन
तो समय आने
पर होगा
लेकिन नई
जिम्मेदारी
की शुरूआत है
तो यही कहना
उचित होगा कि
अपनी तरफ से
मेहनत में
कोई कसर नहीं
छोडूंगा।
भरोसा रखिए,
सबकी
उम्मीदों पर
खरा
उतरूंगा।
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आपके
पिता की
गिनती बहुत
योग्य
मंत्रियों
में होती थी
और अब एक तरह
से आपकी
उनसे तुलना
की जा रही
हैै। इस पर
क्या कहना
चाहेंगे? |
मेरे
पिता
लोकप्रिय
नेता के साथ-साथ
अच्छे
प्रशासक भी
हुआ करते थे।
नया काम आम
आदमी को
ध्यान में
रखकर करना
उनका स्वभाव
था। यही वजह
रही कि
विपक्षी भी
उनके
प्रशंसक थे।
मैंने उनसे
बहुत सीखा है
लेकिन उनसे
मेरी तुलना
नहीं की जानी
चाहिए। मेरे
पिता का कद
हर क्षेत्र
में बहुत बड़ा
था और मेरी
तो अभी
शुरूआत है।
बस इतना ही
चाहता हूं कि
अपने पिता की
तरह सदैव
ईमानदार और
परिश्रमी
बना रहूं।
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क्या
लोगों की
उम्मीदों
पर खरा
उतरने के
लिए
स्वतंत्र
प्रभार
वाला
मंत्री
होना
ज्यादा
उचित रहता?
तब शायद
अपने ढंग से
योजना
बनाना और
उसे लागू
करना आसान
होता? |
बिल्कुल
नहीं। मैं
अभी नौजवान
हूं। अभी तो
मेरी शुरूआत
ही हुई है।
इसलिए बतौर
राज्यमंत्री
अधिक मेहनत
करना और
ज्यादा से
ज्यादा
सीखना ही
मकसद होना
चाहिए। मैं
भाग्यशाली
हूं कि मुझे
मंत्री
बनाया गया
है। मंत्री
बनने का मतलब
यह नहीं है
कि मेरी ताकत
बढ़ गई है
बल्कि इसे
जिम्मेदारी
बढ़ने के तौर
पर देखा जाना
चाहिए। एक
तरह से इसे
चुनौती भी
कहा जा सकता
है। जब इसे
चुनौती कहा
जाता है तो
अधिक
परिश्रम का
स्वाभाविक
दबाव भी रहता
हैै और मुझे
परिश्रम
करना अच्छा
लगता हैै।
इससे
प्रतिफल के
रूप में जब
आम आदमी के
चेहरे पर
मुस्कान
देखने को
मिलती है तो
सारी थकान
गायब हो जाती
है। बतौर
सांसद इसका
मैंने खूब
अनुभव किया
है। अब
मंत्री के
रूप में इसे
देखने का
अवसर
मिलेगा।
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वित्त
और वाणिज्य
जैसे
विषयों के
जानकार
होने से
क्या वहां
का मंत्री
होना
ज्यादा
अच्छा रहता? |
नहीं, मैं
इससे सहमत
नहीं हूं।
मुझे जो
मंत्रालय
मिला है, मैं
उससे पूरी
तरह संतुष्ट
हूं। सोनिया
जी और
प्रधानमंत्री
जी ने जिस
उम्मीद से
मुझे मंत्री
बनाया है अब
बस उसे पूरा
करने का
दायित्व
मेरे कंधों
पर है। मैं
हर भूमिका
में बेहतर और
बेहतर करना
चाहता हूं।
यही मेरा
लक्ष्य है।
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आम आदमी
के लिए
संचार
मंत्रालय
में क्या
किया जा
सकता है ? |
मेरा तो
यह मानना है
कि यहां बहुत
कुछ किया जा
सकता है। आम
आदमी मेरे
जेहन में है,
इसलिए डाकघर
के विषय में
लगातार सोच
रहा हूं।
मेरी कोशिश
रहेगी कि
डाकघर
दुनिया के
लिए खिड़की
बनकर उभरे।
डाकघर का रंग-रूप
बदल जाएगा।
यह आम आदमी
को तमाम तरह
की सुविधाएं
देने वाला ‘सेंटर’
बनेगा।
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गांव
में काम
करने वाले
डाक विभाग
के लाखों
कर्मचारी
अभी भी
अस्थाई बने
हुए हैं, छठे
वेतन आयोग
ने भी उनकी
उपेक्षा की
है। क्या
उनकी सुध ली
जाएगी ? |
उनकी
अवश्य सुध ली
जाएगी। जब
डाकघर
सुधरेगा तो
निश्चित तौर
पर डाकघर में
काम करने
वाले
कर्मचारियों
का जीवन स्तर
भी बेहतर
होगा।
कर्मचारियों
की जो भी
दिक्कतें
हैं, उन पर
गौर किया
जाएगा।
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राजनीतिक
गलियारों
में आपको
युवाओं के
प्रतिनिधि
के तौर पर
देखा जा रहा
है। कहा तो
यह भी जा रहा
है कि
कांग्रेस
में आगे
युवाओं को
जिम्मेदारी
दिया जाना
भी बहुत कुछ
इस पर
निर्भर
करेगा कि
सबसे
होनहार
युवा क्या
कर दिखाता
है? |
पार्टी
में बहुत से
युवा होनहार
हैं और सभी
अपनी
जिम्मेदारियों
को बेहतर ढंग
से अंजाम दे
रहे हैं।
अटकलें
चाहें जो
लगाई जाएं,
पर सच्चाई
यही है कि हम
युवाओं के
बीच किसी तरह
की राजनीतिक
प्रतिस्पर्धा
नहीं है।
महासचिव
राहुल गांधी
तो युवाओं को
आगे लाने का
एक तरह से
अभियान ही
छेड़े हुए
हैं।
राजनीति ही
नहीं, वह तो
प्रत्येक
क्षेत्र में
युवाओं को
जिम्मेदारी
दिए जाने की
लगातार बात
कर रहे हैं।
उनकी बात में
दम हैं। आखिर
दुनिया में
सबसे ज्यादा
युवा भी तो
भारत में ही
हैं। राहुल
गांधी सही
मायने में
देश के
युवाओं को
नेतृत्व दे
रहे हैं और
इसमें कहीं
भी राजनीति
नहीं है।
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मध्य
प्रदेश में
चुनाव करीब
हैं। ऐसे
में आपके
मंत्री
बनने से
राज्य में
कांग्रेस
की सत्ता
में वापसी
की
संभावनाओं
पर क्या
कहना
चाहेंगे? |
किसी एक
व्यक्ति के
कुछ पा जाने
से कुछ नहीं
होता। हम
मेहनत और
अपने अच्छे
कामों से
मध्यप्रदेश
में वापस
लौटेंगे।
मध्यप्रदेश,
मेरा संभाग
और आम आदमी
मेरी
प्राथमिकताओं
पर हैं।
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मंत्री
बनाना
प्रधानमंत्री
का
विवेकाधिकार
होता है
लेकिन क्या
आपकी
सेवाएं
लेने में
देरी हुई है? |
नहीं, कोई
देरी नहीं
हुई। मेरा
सौभाग्य है
कि सोनिया
गांधी और
प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह
ने मुझे इस
लायक समझा।
काम करने के
लिए कभी भी
समय कम नहीं
होता।
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