मदर इंडिया 2008

बारी सेना के जवानों को सलाम करने की हो या देश की माटी के प्रति प्यार जताने की, बाजार अपनी भूमिका इन सबके बीच आसानी से खोज लेता है। नये चलन में शिक्षक और माता-पिता के साथ दोस्तों की अहमियत के सुलेख लिखने में भी कार्ड, गिफ्ट और दूसरे उपहारों को बेचने वाले सौदागर आज काफी माहिर हो गए हैं। संबंध और संवेदनाओं के बीच अपना स्पेस बढ़ा रही बाजारी शक्तियों को लेकर यह गलतफहमी शायद ही किसी को हो कि यह मानवीय सरोकारों और उसकी जड़ों को मजबूत भी करते हैं। आज ‘मदर्स डे’ है, हालांकि इसको हर देश में सेलिब्रेट किया जाता है पर अलग-अलग तिथियों में। हमारे यहां अमेरिका से उधार ली गयी इस तिथि को बाजार ने इस कदर भुनाया है कि हर दुकान, पोस्टर, टीवी चैनलों पर ‘मदरहुड का जश्न’ मनाया जा रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि मदरहुड को क्या वाकई हमारे यहां सम्मान मिलता है? पूर्ण महिला होने के लिए जरूरी है कि वह मां बने, बच्चे का लालन-पालन करे, उसकी जरूरतों को समझे, 24 घंटे उसकी तीमारदारी में लगी रहे। यदि वह कामकाजी है तो भी उसके लिए यह सब करना अनिवार्य है। बदले में उस महिला को क्या मिलता है, कुछ नहीं। मार्केटिग कंपनी में काम करने वाली सुलभा की सुनिए, ‘यह सब हमारी सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यता है, जिसे लोग आज भी मानते हैं। मैं सवाल करती हूं कि बच्चा जब सिर्फ मां का नहीं होता, पिता का भी होता है तो भला पिता उसके लिए कटिबद्ध क्यों नहीं होता?’ सुलभा की बातों में सचाई झलकती है। मां बनना स्त्रियों को यदि पूर्ण करता है तो कन्या भ्रूण हत्या की संख्या हमारे यहां क्यों इतना ज्यादा है? बेटे के जन्म पर थाली बजाई जाती है तो बेटी के जन्म पर मातम क्यों छा जाता है? अस्पतालों में जिस तरह मांओं का ध्यान रखा जाता है, उनकी नौकरी में जो लूप होल्स हैं, उनकी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं क्यों बीच में लटकी रह जाती हैं? ऐसे कई सवालों के बीच ‘मदरहुड सेलिब्रेशन’ की सारी तैयारियां आधी-अधूरी रह जाती हैं।

मां बनना कुदरत की नेमत है, यह सभी मानते हैं, लेकिन जब मां बनने में इतनी तकलीफें झेलती है तो फिर पुरूष उसका लाभ अपने तरीके से क्यों उठाते हैं? 66 वर्षीय भवानी अम्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है। केरल के एरनाकुलम की निवासी भवानी की शादी मात्र 18 वर्ष की उम्र में कर दी गई। 22 साल बाद उनके पति की कैंसर से मौत हो गई लेकिन इस बीच वह मां बनने का सुख नहीं ले पाईं। दूसरी शादी में भी जब वह मां नहीं बन पाई तो अपने पति को दूसरी शादी करने को बाध्य कर दिया। उन्हें बच्चा भी हुआ, लेकिन भवानी अम्मा को उसे देखने भी नहीं दिया गया। ऐसे में भवानी अम्मा ने मेडिकल साइंस का सहारा लिया और 62 वर्ष की उम्र में मां बनीं। भगवान कृष्ण की परम भक्त भवानी अम्मा ने अपने बेटे का नाम कान रखा, लेकिन दो वर्ष में ही उसकी मृत्यु हो गई। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और अब 66 वर्ष की उम्र में भवानी अम्मा मां बनने की तैयारी में हैं। मां बनने का जो जोश और जुनून भवानी अम्मा में है, वह बिरले ही देखने को मिलता है। हां, हिदी फिल्मों में मां को इस भव्यता और खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है कि हर अभिनेता ने कहना शुरू कर दिया, मेरे पास मां हैमदर इंडियामें नरगिस की मां की भूमिका सबको अब तक याद है तो अमिताब बच्चन ने हमेशा कोशिश की कि उनकी मां की भूमिका निरूपमा रॉय ही निभाए।

फिल्मों में भी मां की भूमिका में काफी बदलाव आए हैं। पहले जहां अपने बेटे को बीमार या घायल देख माएं बेहोश हो जाती थीं, वहीं अब की मां हिम्मत बटोरती नजर आती है। रंग दे बसंतीमें किरण खेर को ही लिया जा सकता है, अपने बेटे आमिर खान की मृत्यु पर किरण खेर रोने-बिलखने की बजाय खुश होती हैं कि उनके बेटे की आत्मा मुक्त हो गई। यही किरण खेर हम तुममें अपनी बेटी रानी मुखर्जी के लिए ब्वॉयफ्रेंड ढूंढती हैं। अब रानी को ही ले लीजिए, ता रा रम पममिनी स्कर्ट पहने वह अपने दो बच्चों को कम रूपये में रहने की आदत डलवाती है तो कभी अलविदा न कहनामें प्रीति जिटा अपने बेटे की मां के साथ ही पिता के रोल में भी है।

रील रोल में तो मांओं का रूप बदलता रहा है, यदि रियल रोल की आ॓र देखें तो ऐसी माएं भी रही हैं, जिन्होंने अपनी अभिनेत्री बेटी से काम कराया और उनके मेहनताने पर खुद ऐश किया। सारिका की मां ने सारिका की कमाई सारी दौलत हड़प ली और उन्हें सड़कों पर छोड़ दिया। जिस हेमा मालिनी ने बागबानमें ग्लैमरस मां का रोल निभाया, उन्हीं की मां ने उनके साथ खूब सख्ती बरती। हेमा ने खुद कई बार कहा है, मुझे आज तक नहीं समझ में आया कि मां क्यों मेरे साथ इतनी सख्ती बरतती थीं। मैं अपनी बेटियों के साथ बहुत फ्रेंडली हूं।काजोल की नानी शोभना समर्थ 40वें दशक की नामी हीरोइन थीं। भले ही शोभना समर्थ का अपनी बेटी नूतन के साथ लंबे समय तक मुकदमा चला हो, लेकिन वह अपने जमाने में विचारों को लेकर बेहद आधुनिक थीं। उन्होंने उसी समय कहा था, मैं अपनी बेटियों को दहेज देने के बदले घर दूंगी ताकि यदि उनकी शादीशुदा जिदगी ठीक न चले तो उन्हें रहने में दिक्कत न हो।मांओं ने तो हमेशा अपने बच्चों के लिए अपनी सामर्थ्य से बढ़कर किया है। अब बारी है उनके बच्चों की, जिस तरह संजय लीला भंसाली ने अपने नाम के साथ मां का नाम लगाया है। जैसा कि एक अवार्ड लेने के दौरान उन्होंने अपनी मां लीला को स्टेज पर बुलाते हुए कहा कि मेरी मां ने अब तक मेरे सारे दुखों का भागीदार रही हैं, अब मेरी खुशी को बांटने का समय है।

स्पर्धा

मां तुझे सलाम....

आरती (टीचर) का कहना है कि पहले मदर्स डेनहीं मनाया जाता था लेकिन फैलते बाजारवाद के कारण अनेक डे मनाये जाने लगे हैं। जिसमें मदर्स डेभी शामिल है। मदर्स डे के नाम पर मेरे सामने मां का प्यार और उसके हाथों का खाना अनायास ही याद आने लगता है। हमेशा मां का सजीव चित्र सामने रहता है। खास बात तो यह भी है कि जब मैं मां के पास रहती थी तो मां की डांट तो पड़ती थी लेकिन मां अच्छी दोस्त के रूप में मेरी मदद भी करती थी। मां बुरे समय में मेरी मदद करती थी और गलती करने पर डांटती थी। मां के साथ रहने पर न तो कपड़े धुलने की चिता होती थी और न खाने की सुध लेकिन अब वह सब जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ती है।

एस. के डोगरा (यूटीआई बैंक के पूर्व वाइस प्रेसीडेंट) का कहना है कि आज के दिन मां की बहुत याद आती है। क्योंकि विगिा अखबारों व टीवी चैनलों पर मदस डेकी चर्चा होती रहती है। मां के रहने पर न तो कोई चिता थी और न ही परेशानी। यह अलग बात है कि मां जब डांटती थी तो बुरा लगता था लेकिन आज मां की कमी खलती है। मां के हाथों का स्पर्श अपने आप में औषधि का काम करती थी। नौकरी की तलाश में जब मैं विभिा ऑफिसों का चक्कर लगाता था तो घर में मां ही थी जो मेरी परेशानी को समझती थी और मेरा मनोबल ऊंचा करती थी। अब मां की बहुत याद आती है। मां तुझे सलाम।

अनुष्का (छात्रा) का कहना है कि मां मुझे तब बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती, जब वह मेरी पिटाई करती है लेकिन मेरी मम्मी बहुत अच्छी है। मैं मम्मी के बिना एक रात भी नहीं रह पाती हूं। यह सच है कि मम्मी गलती काम करने पर डांटती है लेकिन जब मैं परेशान या थकी होती हूं तो मुझे खूब प्यार व दुलार देती है। मम्मी जॉब करने के साथ-साथ घर के सभी सदस्यों का ध्यान पूरी तरह रखती हैं। मेरी मम्मी बहुत अच्छी और प्यारी है।

मेधा (प्रोफेसर) का कहना है कि मां के पास जो सुख मिलता है। वह पूरी जिदगी कहीं भी नहीं मिलता है। जब मैं काफी बड़ी हो गयी थी तब भी मम्मी अपने हाथ से मुझे खाना खिलाती थी जो आज भी मैं मिस करती हूं। मम्मी के गोद में सिर रखना और फिर उन्हीं से सारा काम कराना। न तो कोई जिम्मेदारी होती थी और न ही कोई काम। आराम से सभी ख्वाहिशें पूरी करा लेना। आज भी याद आती है मां।

अर्चना तिवारी

कितना प्यार करते है आपके बच्चे

मदर्स डे सेलिब्रेट करने में आपके बच्चे मशगूल होंगे, उनके उत्साह को देख कर आप फूली नहीं समा रही होंगी। हमेशा आप ही उनके लिए सब कुछ करती आ रही थीं, अब ऐसे उत्सव से आपको अहसास कराते हैं कि दरअसल वे भी आपको उतना ही प्यार करते हैं, जितना आप करती आ रही हैं। केवल गिफ्ट देने से ही प्यार नहीं झलकता। आपके बच्चे आपको कितना प्यार करते हैं जानने के लिए झट से टिक मारिए इन सवालों के जवाब पर -

* सुबह उठते ही आपके गले पर झूल गये बच्चे -

1. हां, 2. कुछ-कुछ, 3. बिल्कुल नहीं

* सरप्राइज गिफ्ट से चौंका दिया आपको -

1. हां, 2. थोड़ा सा, 3. बिल्कुल नहीं

* आज तो बेड टी ही दे दी आपको -

1. हां, 2. कोशिश की, 3. बिल्कुल नहीं

* आपको कहीं डिनर पर ले जाने का प्लान है-

1. हां, 2. शायद, 3. कहीं नहीं

* चूंकि वे बाहर हैं इसलिए फोन या कूरियर से प्यार बांटा -

1. हां, 2. आ सकता है, 3. नहीं

* अपनेपन और नजदीकियों का वे गर्मजोशी से अहसास कराते हैं-

1. सही बात, 2. कई दफा, 3. ऐसा नहीं है

* आपको जरूरत का हर सामान लाकर देते हैं या उसकी वकालत करते हैं -

1. हां, 2. कभी-कभी, 3. बिल्कुल नहीं

* आपके बिना रहना उनके लिए मुमकिन नहीं है-

1. हां, 2. कभी कभी, 3. नहीं

* आपके हाथ की बनी चीजों के वे दीवाने हैं -

1. बिल्कुल नहीं, 2. कभी-कभी, 3. हां

* उनके जीवन व करियर में आपका बड़ा हाथ है, यह अहसास कराते हैं -

1. हमेशा, 2. शायद कभी, 3. नहीं

* के लिए 2, 2 के लिए 1 और तीन लिए 0 अंक जोड़ें।

20 से 14 अंक अगर आपके आते हैं तो आपके बच्चे आपको पलकों पर बिठा कर रखते हैं। आपकी जो जगह है, वह सबको नहीं मिलती। इस प्यार को संभाल कर रखिए। अधिक प्यार को नजर भी लग जाती है।

13 से 7 अंक आने का मतलब है, आप के बच्चे आपको बहुत प्यार करते तो हैं पर शायद उतना जता नहीं पाते। हो सकता है आप भी प्यार जताने में कोताही करती हों। बांटिए अपने प्यार को, जितना हो सके। उनको बिना डिस्टर्ब किये, बस प्रेमपूर्ण वातावरण बनाए रहें।

7 से कम अंक आने का मतलब है, आपके बच्चे कहीं न कहीं आपसे भयभीत भी रहते हैं। उनको अपने नजदीक आने दीजिए। भावनाएं बांटने में कोई कोताही न करिए। आपने उनको जीवन दिया है, बिना इस बात का अहसास दिखाए, ढेर सारा प्यार दीजिए। जब आप प्यार देंगी तभी बदले में आपको प्यार मिलेगा।

बेटों के लिए खास है मदर्स डे

अमूमन लोगों के मुंह से यह सुनाई देता है कि जितना प्यार लड़कियों को अपनी मां से होता है, उतना लड़कों को नहीं होता। भले ही आप इसे 100 प्रतिशत सच मानें, लेकिन रिसर्च तो दूसरे ही सच बयां करते हैं। हाल में हुए अध्ययन में सामने आया कि मदर्स डे पर बेटी की तुलना में बेटे मां को कहीं ज्यादा गिफ्ट भेंट करते हैं। यह सर्वे कंज्यूमर प्लान की आ॓र से किया गया। उनके अनुसार 90 प्रतिशत लोग मदर्स डेसेलिब्रेट करते हैं। इनके अनुसार मदर्स डे को सेलिब्रेट करने के लिए लड़कों की खरीदारी का बजट लड़कियों की तुलना में डेढ़ गुना ज्यादा होता है। गिफ्ट लिस्ट में मदर्स डे के लिए फीमेल की परचेंिजंग लिस्ट में जहां कार्ड्स, फूल, गिफ्ट वाउचर्स, कपड़े, ज्वेलरी व चॉकलेट आदि होती हैं, वहीं मेल इलेक्ट्रॉनिक आयटम, बुक की शॉपिग करते हैं।

शॉपिग आयटम्स की लिस्ट तो अलग होती ही है। साथ ही गिफ्ट की खरीदारी कहां से होगी, इसमे भी खासे चूजी होते हैं बेटे। अपनी मां को गिफ्ट करने के लिए मेल कंज्यूमर्स का सबसे बड़ा भाग यानी कि 35 प्रतिशत पुरूष स्पेशियलिटी स्टोर्स से अपनी मां के लिए गिफ्ट खरीदते हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत पुरूष डिपार्टमेंटल स्टोर से व 20 प्रतिशत लोग ऑनलाइन शॉपिग के जरिए गिफ्ट भेंट करते हैं। इनके साथ-साथ 10 प्रतिशत मेल कैटलॉग के आधार पर शॉपिग करते हैं। इतने प्रतिशत ही लोग और भी हैं, जिन्हें उन स्टोर्स से खरीदारी पसंद है, जहां डिस्काउंट या ऑफर सीजन चल रहा हो। डिस्काउंट के बूते ये कम पैसे में बेहतर गिफ्ट लेकर अपनी मां को मदर्स डे ग्रीट करने की ख्वाहिश पूरी करते हैं।

सर्वे के अनुसार पुरूष अपनी मां को गिफ्ट देने के लिए जहां डिपार्टमेंटल स्टोर या स्पेशल शॉप से खरीदारी करना पसंद करते हैं, वहीं अधिकतर लड़कियां डिस्काउंट डिपार्टमेंटल स्टोर का सहारा लेती हैं। 47.7 प्रतिशत बेटे मां को बाहर डिनर पर ले जाकर इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं, जबकि सिर्फ 29 प्रतिशत बेटियां ही मां के साथ डेट पर जाना पसंद करती हैं। 27 प्रतिशत बेटियां मां को मनचाही ड्रेस देती हैं तो केवल 18.6 प्रतिशत बेटे कपड़े भेंट करने में रूचि लेते हैं। कंज्यूमर प्लान द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार, मदर्स डे पर बेटे अपनी एक दिन की कमाई का 86 प्रतिशत तक खर्च करने को तैयार रहते हैं। वहीं बेटियां इस दौड़ में थोड़ी पीछे नजर आती हैं। बेटियां मां को मदर्स डे पर गिफ्ट तो देना चाहती हैं लेकिन अपने एक दिन की कमाई का महज 60 प्रतिशत ही खर्च करने को तैयार होती हैं।

रेनू शुक्ला

पेज डिजाइनिंग : अनिल वर्मा

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