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आजादी नहीं , हमें सिर्फ स्वायत्तता चाहिए : दलाई लामा
पूरे तिब्बत में पिछले छह दशकों से रह रहे तिब्बती जिन्हें चोल्खा–सम (यू–शांग, खाम तथा आमदो) के नाम से जाना जाता है, चीनी सरकार की दमनकारी नीतियों के साये में जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उनकी धार्मिक मान्यताओं, अनोखी सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीयता के बोध ने उन्हें इस आस से बांधे रखा है कि कभी तो आजादी मिलेगी। इस उम्मीद के चलते वे शाांतिपूर्ण ढंग से निरंतर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करते रहते हैं। गत दिनों भड़की हिंसा भी इसी कारण हुई, जब 10 मार्च, 1959 की उस घटना की 49वीं बरसी के मौके पर तमाम लोग इकट्ठा होकर उन शहीदों को याद कर रहे थे, जिन्होंने इसी दिन ल्हासा में शुरू हुए इस आंदोलन में अपनी जान गंवा दी थी। चीन ने उनके इस शांतिपूर्ण मार्च पर न सिर्फ दमनात्मक कार्रवाई की, बल्कि खूनखराबा किया जिसमें करीब सौ से ज्यादा बौद्ध भिक्षुओं की जान गई। इस पूरे मामले की निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच की जानी चाहिए, ताकि दुनिया के सामने सच आ सके। कहने को तो तिब्बत को स्वायत्त क्षेत्र, स्वायत्त देश तथा स्वायत्तशासी प्रदेश जैसे अलग–अलग नामों से जाना जाता है लेकिन यह स्वायत्तता सिर्फ नाम की है और हकीकत में तिब्बत को कभी स्वायत्तता मिली ही नहीं। बड़ी अजीब बात तो यह है कि इस पर उन लोगों का शासन चलता है जो इस क्षेत्र की परिस्थितियों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। चीनी सरकार की इसी अदूरदर्शी नीतियों की वजह से तिब्बत का कुदरती माहौल पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। उनकी जनसंख्या स्थानांतरण की नीतियों की वजह से आज पूरे क्षेत्र में गैर तिब्बती आबादी कई गुना बढ़ गई है और तिब्बती खुद अपने ही वतन में अल्पसंख्यक बनकर रह गए हैं। इसके अलावा भाषा, रीति–रिवाज तथा परंपराएं, जिनसे तिब्बत की मूल पहचान है, वह धूमिल पड़ती जा रही है। तिब्बतियों को चारों तरफ से चीनी आबादी द्वारा घेर लिया गया है। चीन द्वारा तिब्बतियों के दमन का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन, धार्मिक आजादी पर पाबंदी तथा धार्मिक मुद्दों का राजनीतिकरण किया जा रहा है। आधुनिक ज्ञान के क्षेत्र में तिब्बत के लोग काफी पीछे छूट चुके हैं। यह सब चीनी सरकार के तिब्बतियों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण हो रहा है। इसी का नतीजा है कि लगभग डेढ़ लाख तिब्बती निर्वासित जीवन जीने को विवश हैं। तिब्बतियों का धर्मगुरू होने के बावजूद मैं एक बेघर इंसान हूं और अपनी जिंदगी का बेहतर हिस्सा (करीब 24 साल की उम्र से) मैंने भारत सरकार के मेहमान के तौर पर गुजारा है। इसी छद्म स्वायत्तता का नतीजा है कि इस क्षेत्र के मूल निवासियों की सूरतेहाल में बजाय कोई तब्दीली होने के दिन–ब–दिन हालात और खराब होते जा रहे हैं। इन्हीं छल-कपट वाली नीतियों की वजह से न सिर्फ तिब्बतियों को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि चीन की एकता और अखंडता भी असरअंदाज हो रही है। चीनी सरकार का तिब्बत पर सन 1951 से कब्जा है जिसकी स्वायत्तता की मांग हम हमेशा से करते रहे हैं। हम अलग देश की मांग नहीं कर रहे हैं, सिर्फ अपनी उस स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं जिससे हम खुली फिजा में सांस ले सकें। अपने धर्म, संस्कृति और रीति–रिवाजों की रक्षा कर सकें। मैंने हमेशा चीन सरकार से ऐसी नीति अमल में लाने की अपील की है जो दोनों के निहितार्थ हो और ऐसा आम सहमति से ही मुमकिन है। सन 2002 से लेकर अब तक मेरे प्रतिनिधियों ने चीन गणराज्य की सरकार से इस मुद्दे पर लगभग छह राउंड की वार्ता की। इससे चीन सरकार के कुछ संदेह तो साफ हुए, मगर मूल मुद्दे पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। पिछले कुछ बरसों से तो चीन की दमनात्मक कार्रवाई और बर्बरतापूर्वक रूख अख्तियार कर गई है। इस मायूसकुन नतीजे के बावजूद मैं फिर चीन सरकार से बीच का रास्ता निकालने का आग्रह करता हूं और बातचीत के जरिए मसले को सुलझाने की अपील करता हूं। अपने आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया की वजह से चीन एक काफी ताकतवर मुल्क बनकर उभर रहा है। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके साथ ही चीन को वैश्विक स्तर पर भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका मिला है। पूरा विश्व बड़ी पुरउम्मीद निगाहों से चीनी नेतृत्व की आ॓र देख रहा है कि वह किस तरह से सामाजिक एकता और शांति को बढ़ावा देगा। इसके लिए उसे सिर्फ अर्थव्यवस्था की तरक्की नहीं, बल्कि कानून में पारदर्शिता, सूचना का अधिकार तथा अभिव्यक्ति की आजादी जैसी बातें अमल में लानी होंगी। हमने जब भी चीनी सरकार की आ॓र अपना दाहिना हाथ बढ़ाया, तो बजाय इसे गर्मजोशी से थामने के, चीन ने खाली ही लौटा दिया। अब हमारा बायां हाथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आ॓र है, जिनसे मैं मदद की गुहार लगा रहा हूं। मैं शुक्रगुजार हूं पूरे विश्व की उन सरकारों, गैरसरकारी संगठनों तथा व्यक्ति विशेष का, जिन्हें अमन–शांति प्रिय है और इसके लिए उन्होंने हमेशा तिब्बत का समर्थन किया। मैं भारत सरकार का विशेष तौर पर आभारी हूं, जिसने हमेशा हमारा साथ दिया और निर्वासित तिब्बतियों को अपने यहां पनाह दी। अब जबकि भारत और चीन के संबंध काफी मधुर हैं, ऐसे में भारत की जिम्मेदारियां काफी बढ़ जाती हैं। मैंने हमेशा भारत–चीन के बेहतर ताल्लुकात की वकालत की है, इससे तिब्बत के मसले का हल निकालने में मदद मिलेगी। हालांकि मैं जानता हूं कि भारत की कुछ सीमाएं हैं लेकिन मैं अपनी भारत सरकार के पिछले 49 बरसों तक दिए गए समर्थन से संबंधित वह बात फिर याद दिलाना चाहूंगा कि भारत ‘गुरू’ है और ‘तिब्बत’ उसका शिष्य। इसके साथ ही मैं अगस्त माह में चीन में होने वाले आ॓लंपिक खेलों का भी स्वागत करता हूं और चीन को एक अच्छे मेजबान बनने की सलाह देता हूं। इस तरह के अंतरराष्ट्रीय खेलों के आयोजन से बोलने व अभिव्यक्ति की आजादी, समानता तथा मित्रता को बढ़ावा मिलता है और चीन को स्वयं इन बातों का अनुपालन करके अपने आपको एक अच्छा मेजबान साबित करना चाहिए। इसके अलावा मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी यह अपील करता हूं कि वे अपने एथलीटों को भेजते समय चीन को इन मुद्दों की याद दिलाएं। (रमेश ठाकुर द्वारा ई–मेल पर की गई प्रश्नोत्तरी पर आधारित) तिब्बत
की ऐतिहासिक
घटनाएं * 1063 ईसा पूर्व में गुरू शेनराब मीवो ने तिब्बती बॉन धर्म की स्थापना की। इसके बाद यहां 18 शांगशुंग वंश के राजाओं ने शासन किया। * 127 ईसा पूर्व यहां नरेश न्यात्री त्सेनपो का शासन था। यह वंश एक हजार से अधिक वर्षों तक कायम रहा। आंगत्सेन गाम्पो, त्रिसान देत्सेन और राल्पाचेन इस वंश के प्रमुख शासक थे। ये तीनों तिब्बती इतिहास में ‘तीन महान नरेश’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। * सन 173 में सम्राट ला थो तोड़ी यात्सेन के समय में बौद्ध धर्म चीन पहुंचा। * सन 617 में राजा सौगत्सेन के दौर में तिब्बती विद्वान थॉनमी सान मोटा भारत आए। यहां से लौटने के बाद उन्होंने तिब्बती भाषा और व्याकरण को लिखित आकार दिया। * 755–97 के बीच त्रिसांग देत्सेन के शासन के दौरान तिब्बती साम्राज्य अपने चरम पर था और उनकी सेना ने चीन और कई मध्य एशियाई देशों पर चढ़ाई की। तत्कालीन चीनी राजधानी चांग ऐन को भी उन्होंने फतह किया। * 821 में नरेश राल्पाछेन के शासन के दौरान तिब्बत–चीन में एक बार और युद्ध हुआ, जिसमें तिब्बत की जीत हुई। लिखित संधि द्वारा दोनों देशों की सीमाएं तय की गईं। * 842 में नरेश त्रि वुडुम त्सेन की हत्या के बाद महान तिब्बती साम्राज्य कई छोटे–छोटे राज्यों में बंट गया। 842 से 1247 तक का समय तिब्बत के लिए अंधकार का युग रहा। * 1249 से 1368 के बीच तिब्बत पर मंगोलों का कब्जा, किंतु इस दौरान तिब्बती सभ्यता को किसी तरह की चोट नहीं पहुचाई गयी। * 1751 में मंचू शासन के दौरान पहली बार ल्हासा तक चीनी सेना आई। सेना आने का कारण जंगारों से तिब्बतियों की रक्षा करना बताया गया। * 1904 में अंग्रेज जनरल हसबैंड तिब्बत पहुंचा। तिब्बत से अंग्रेजों की संधि हुई। * 1909 में चीन ने तिब्बत पर हमला किया। तेरहवें दलाई लामा को भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी। * 1911 में चीन में चल रहे गृहयुद्ध का लाभ उठाकर तिब्बतियों ने पुन: तिब्बत को प्राप्त कर लिया। * 1911–13 के दौरान ब्रिटेन द्वारा तिब्बत को ‘बफर स्टेट’ के रूप में मान्यता। इस पर चीनी नेताओं में नाराजगी। * 1913 में मंगोलिया से समझौते कर तिब्बत ने खुद को स्वतंत्र देश घोषित किया गया। तेरहवें करमापा लामा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की मौजूदगी को पुख्ता किया। आधुनिकीकरण की शुरूआत की। * 1944 में ब्रिटिश–अमेरिकी फौज ने तिब्बत की सरकार से वहां से गुजरने की अनुमति मांगी। तिब्बत ने खुद को निष्पक्ष बताते हुए अनुमति देने से इंकार किया। * 1947 में नई दिल्ली में एफ्रो–एशियाई देशों के सम्मेलन में तिब्बत ने स्वतंत्र देश के रूप में भाग लिया। * 1950 में चीनी गणराज्य की स्थापना के बाद 84 हजार सैनिकों ने तिब्बत के पूर्वी प्रांत खाम पर हमला कर दिया। * 1951 में चीन और तिब्बत के बीच 17 सूत्री समझौता। समझौते में चीन द्वारा तिब्बत की सांस्कृतिक–धार्मिक स्वतंत्रता कायम रखने का वायदा। समझौते पर चीनी सरकार ने तिब्बती प्रतिनिधिमंडल से जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाए। * 1956 में बुद्ध की 2500 वीं जयंती पर दलाई लामा का भारत आगमन। लामा ने चीनी शासन के खिलाफ रोष व्यक्त किया। इससे चीन में काफी नाराजगी। * 1959 में चीन द्वारा तिब्बत पर धावा। सैकड़ों मठों को जलाया गया और इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले स्थानीय लोगों पर कड़ी कार्रवाई की गई। इसके खिलाफ तिब्बती सड़कों पर उतर आए। इसे ‘खम्फा विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है। इस विद्रोह में अनुमानत: 5 लाख लोग मारे गए। दलाई लामा का भारत निर्वासन। * 1960 में ‘तिब्बती जन प्रतिनिधि सभा’ की स्थापना की गई और तिब्बती संविधान के निर्माण की घोषणा हुई। * 1971 में चीन के राष्ट्रपति देंग शिआ॓पेंग ने तत्कालीन दलाई लामा से ‘स्वतंत्रता की मांग’ छोड़ने की शर्त पर समझौते की बात कही। * 1987 में दलाई लामा द्वारा 5 सूत्री शांति कार्यक्रम की घोषणा की गई। शांति कार्यक्रम को चीन द्वारा ठुकराए जाने के बाद 1987–88 के बीच राजधानी ल्हासा में जोरदार बगावत। * 1988 में दलाई लामा की स्ट्रासबर्ग घोषणा। स्वायत्तता के प्रश्न पर सहमति। चीन का इंकार। * 1990 में निर्वासित तिब्बती सरकार पूर्ण रूप से ‘चार्टर फॉर टिबेटन्स इन एक्साइल’ के आधार पर चलने की नीति बनाई। सुलग रहा है तिब्बत डा. गौरीशंकर राजहंस
तिब्बत की राजधानी ल्हासा में जो जनाक्रोश फूट पड़ा है, उसके पीछे एक इतिहास है। तिब्बत सदा से एक स्वतंत्र देश रहा है। प्राय: डेढ़ सौ वर्ष पहले इतिहास में एक ऐसा समय भी आया था, जब तिब्बत ने चीन की मुख्य-भूमि पर राज किया था। जब अंग्रेजों का राज भारत में था तब उन्होंने तिब्बत को एक तरह से भारत का ‘प्रोटेक्टोरेट’ बनाया था। जैसे भूटान और सिक्किम भारत के ‘प्रोटेक्टोरेट’ थे। सिक्किम तो बाद में अपनी इच्छा से भारत में सम्मिलित हो गया। परन्तु, भूटान अब भी भारत का ‘प्रोटेक्टोरेट’ है। अंग्रेजों के समय में तिब्बत में भारतीय सिक्का चलता था। भारतीय फौज की एक टुकड़ी वहां पर स्थाई रूप से रहती थी। यहां तक कि भारतीय ‘पोस्ट ऑफिस’ भी वहां काम करता था। तिब्बतवासियों और भारतीयों के प्रगाढ़ सांस्कृतिक संबंध सदियों से थे, परन्तु सबकुछ बदल गया, जब 1949 में चीन की मुख्य-भूमि पर साम्यवादियों का कब्जा हो गया। भारत को 1947 में आजादी मिली थी। चीन के साम्यवादी अनेक वषोर्ं तक अंग्रेज तथा पश्चिम के देशों के समर्थक चांग काई शेक से लड़ते रहे। अन्त में साम्यवादियों की जीत हुई। चीन की मुख्य-भूमि पर उनका कब्जा हो गया और चांग काई शेक भागकर पडा़ेस के द्वीप ‘फारमोसा’ चले गये जिसे अब ‘ताइवान’ कहते हैं। चीन के सर्वोच्च नेता माआ॓ त्से तुंग ने उस समय कहा था कि चीन की आजादी तब तक पूरी नहीं होगी जब तक चीन तिब्बत पर अपना आधिपत्य नहीं जमा लेता है। उनके आदेश से चीन की फौज जिसे ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ कहते हैं, 1951 में तिब्बत में घुस गई और बड़ी बेरहमी से स्थानीय तिब्बतियों का दमन शुरू कर दिया । भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जहाहरलाल नेहरू इस मत के थे कि भारत की तरह चीन भी पश्चिम के उपनिवेशवादी देशों का सताया हुआ है, अत: जब चीन इन देशों के चंगुल से निकल जाएगा तो भारत और चीन घनिष्ठ मित्र हो जाएंगे, परन्तु दुर्भाग्यवश यह उनकी भूल थी। गत 3 हजार वर्षों में चीन हमेशा से विस्तारवादी देश रहा है। चाहे वहां पर जिसकी भी सरकार रही हो। जब ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ तिब्बत में 1951 में घुस गई, तब पंडित नेहरू ने घोर आश्चर्य प्रकट किया और चीन के शासकों से कहा कि वे अपना दमनकारी रवैया समाप्त करें और तिब्बत की संस्कृति अक्षुण्ण रहने दें। जवाब में चीन के नेताओं ने पंडित नेहरू को दिग्भ्रमित करने के ख्याल से कहा कि तिब्बत पहले की तरह ही एक ‘स्वायत्त क्षेत्र’ रहेगा और चीन किसी भी प्रकार उसके आन्तरिक मामलों में या उसके प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करेगा और न बौद्ध धर्म से कोई छेड़छाड़ करेगा, परन्तु चीन ने ठीक उसका उल्टा किया और धड़ल्ले से तिब्बत खासकर ल्हासा के बौद्ध मठों को ध्वस्त करता गया। तत्कालीन भारत सरकार दुखी होकर तिब्बत में चीन द्वारा की जा रही दमनकारी हरकतों को देखती रही और बार-बार चीन को उसके वायदे की याद दिलाती रही कि उसने वादा किया था कि वह तिब्बत की स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखेगा और उसकी संस्कृति से कोई छेड़छाड़ नहीं करेगा, परन्तु हर बार चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई पंडित नेहरू को आश्वस्त करते रहे कि चीन तिब्बत के आन्तरिक मामलों में कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहा है। पश्चिम के देशों का मीडिया जानबूझकर तिब्बत की छोटी-छोटी घटनाओं को तूल देकर सारे संसार में पेश कर रहा है। चीन भारत का निकटतम मित्र है। अत: भारत को चीन की सरकार की बातों पर पूरा भरोसा करना चाहिए! अब तक पंडित नेहरू चीन की धोखाधड़ी को अच्छी तरह समझ गये थे, परन्तु अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में वे अपने को असहाय पा रहे थे। कारण कि अमेरिका और ब्रिटेन ने कश्मीर समस्या को लेकर निर्लज्जतापूर्वक पाकिस्तान का साथ दे दिया था। उन दिनों रूस और चीन दूध-पानी की तरह घुले मिले थे। अमेरिका और ब्रिटेन पाकिस्तान के उकसाने पर बार-बार सुरक्षा परिषद में यह प्रस्ताव पास कराना चाहते थे कि कश्मीर में जनमत संग्रह होना चाहिए। ऐसे में, भारत ने रूस की आ॓र दोस्ती का हाथ बढ़ाया और जब-जब अमेरिका तथा ब्रिटेन सुरक्षा परिषद में कश्मीर की समस्या पर कोई प्रस्ताव पास करना चाहते थे, तब-तब रूस ने अपने वीटो द्वारा उसे निरस्त कर दिया। रूस और चीन की प्रगाढ़ दोस्ती को देखते हुए पंडित नेहरू खून का घूंट पीकर रह जाते थे और चीन द्वारा तिब्बत में किये जा रहे दमनकारी रवैये का विरोध नहीं कर पाते थे। इस बीच, चीन धड़ल्ले से भारत की भूमि पर चोरी-छिपे कब्जा रह रहा था। तिब्बत में, खासकर उसकी राजधानी ल्हासा में बौद्ध मठों को बेरहमी से तो ध्वस्त किया ही जा रहा था। चीन सरकार ने गुपचुप एक योजना बनाई, जिसके मुताबिक, तिब्बतियों के धर्मगुरू दलाई लामा को गिरफ्तार कर बीजिंग ले जाना चाहती थी। दलाई लामा को इसकी भनक लग गई आ॓र वे 1959 में 10 मार्च को चुपचाप अंधेरी रात में पैदल दुर्गम पहाड़ियों और जंगलों से गुजर कर भारत पहुंच गये। पंडित नेहरू ने संसद में इस बात का एलान किया कि दलाई लामा भारत आ गये हैं और भारत सरकार ने उन्हें अपने यहां राजनीतिक शरण दे दी है। यह जानकर चीन सरकार आगबबूला हो गई। भारत और चीन के रिश्ते लगातार बिगड़ते गये, जिसकी परिणति यह हुई कि चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया। तब से भारत चीन संबंधों में सुधार अवश्य हुआ है, परन्तु सच कहा जाए तो चीन की नीयत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वह ऊपर से भारत के साथ मित्रता का स्वांग रचता है और अन्दर ही अन्दर भारत के विरूद्ध षड्यंत्र करने से बाज नहीं आता है। तिब्बत संस्कृति को तो उसने पूरी तरह नष्ट कर दिया है। वहां के प्रसिद्व बौद्ध मठों को ध्वस्त कर दिया है। ल्हासा में प्रसिद्व बौद्ध मठों को ध्वस्त करके उनकी जगह बड़े-बड़े होटल बना दिये गये हैं। भारी संख्या में चीन की मुख्य-भूमि से ‘हान’ जाति के चीनियों को लाकर ल्हासा तथा तिब्बत के दूसरे शहरों में बसाया जा रहा है और यह प्रयास किया जा है कि तिब्बत की मूल जनता अल्पमत में आ जाए! आगामी अगस्त महीने में चीन में आ॓लम्पिक गेम होने वाले हैं, इसके लिये ग्रीस की राजधानी एथेन्स से आ॓लम्पिक मशाल लेकर आ॓लम्पिक खिलाड़ी करीब 20 देशों से गुजरते हुए चीन पहुंचेंगे। यह सच है कि जो लोग तिब्बत की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, उनका यह मत है कि यह एक उपयुक्त समय है जब तिब्बतियों की दुर्दशा पर सारे संसार का ध्यान आर्किष्ात किया जा सके। इसीलिए उन्होंने यह योजना बनाई है कि आ॓लम्पिक खिलाड़ियों के समानान्तर उन लोगों की भी एक रिले दौड़ होगी, जो इन सभी देशवासियों का ध्यान तिब्बतियों की दयनीय स्थिति की आ॓र आकर्षित करेगी। यह जानकर चीन आगबबूला हो गया है। चीनी योजना है कि चीन और नेपाल होकर मशाल ले जाते हुए इन खिलाड़ियों को एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचाया जा सके। तिब्बत और नेपाल में बौद्ध भिक्षुओं के चीन के खिलाफ बढ़ते हुए रोष को देखकर चीन की सरकार यह निर्णय नहीं कर पा रही है कि उसे क्या करना चाहिए? चीन का दमनकारी रवैया जगजाहिर है। 1989 में उसने ‘थियानमन चौक’ पर जिस तरह निर्दोष छात्रों को बेरहमी से कुचल दिया था, उसे याद कर आज भी सारी दुनिया सिहर जाती है। यह सच है कि अगस्त महीने में होने वाले आ॓लम्पिक खेलों के दौरान चीन सारी दुनिया को अपना लोकतांत्रिक और मानवतावादी चेहरा दिखाना चाहेगा। यह कहना कठिन है कि अपने इस प्रयास में चीन सफल हो पाएगा अथवा नहीं! (लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं) तिब्बत की पीड़ा : चीन का पाप आनंद कुमार तिब्बत पर चीन ने 1949 और 1959 के बीच कम्युनिस्ट क्रांति के प्रभावों का एशिया में विस्तार करने की रणनीति के अंतर्गत कब्जा जमाया। इसे डॉ. लोहिया ने ‘शिशु हत्या’ की संज्ञा दी लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने ‘हिंदी-चीनी, भाई-भाई’ के नारे के शोर में चीनी विस्तारवाद की उपेक्षा करने की अक्षम्य भूल की। फिर 1962 में खुद भारत की 90,000 वर्गमील भूमि पर चीनी सेना ने कब्जा कर लिया, तो पंडित नेहरू को राष्ट्र को बताना पड़ा कि हम विश्वासघात के शिकार हो गए हैं। तब से आज तक चीन का हमारे नीति-निर्माताओं के दिल और दिमाग पर आतंक बना हुआ है। हमारा नीति प्रतिष्ठान चीन की हर हरकत की पहले अनदेखी करने की कोशिश करता है। जब पानी सिर से गुजरने लगता है तो गंभीरता को कम करके पेश किया जाता है और चीन से संबंध सुधारने का नारा तेज हो जाता है। इस लीपापोती की आधी शताब्दी में एक तरफ समूचे एशिया में हमारी तुलना में चीन का दबदबा बढ़ा है और दूसरी तरफ भारत का सैनिक खर्च भी बढ़ा है। हमारी तुलना में तिब्बत छोटा राष्ट्र है। चीन ने उसको पूरी तरह से निगल लिया है। वैसे भूगोल की दृष्टि से तिब्बत एक विराट राष्ट्र रहा है जिसकी सीमाएं चीन, भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार व मंगोलिया से मिलती हैं, लेकिन जनसंख्या की दृष्टि से यह 60 लाख से भी कम आबादी का देश है। फिर भी इसकी सांस्कृतिक जड़ें बहुत गहरी हैं और सभ्यता के रूप में इनकी शताब्दियों पुरानी निरन्तरता का इतिहास है। भाषा, लिपि, धर्म, राज्य व्यवस्था, मुद्रा और व्यापार के संदर्भ में तिब्बत की अपनी पहचान सदियों लंबी है। इसको भारतीय संस्कृति से बुद्ध धर्म मिला। इसलिए तिब्बती लोग भारत को अपना पड़ोसी ही नहीं, ‘गुरू देश’ भी मानते हैं। भारत के हिमालय क्षेत्र में बौद्ध धर्म की महायान धारा का लद्दाख से लेकर अरूणाचल तक प्रसार हुआ है जिसका केन्द्र तिब्बत ही है। इस विशष्टि धार्मिक एकता के कारण तिब्बत का भारत से सदैव अभिन्नता का संबंध रहता आया है। इसी अभिन्नता ने समूचे इतिहास में तिब्बत को भारतीय संस्कृति का रक्षक व वाहक भी बनाया, क्योंकि चीनी विकासवादी शासकों के अभियानों ने भारत को तिब्बत के लोगों के प्रतिरोध से बार-बार बचाया। जब तिब्बत खुद पराजित हो गया, तभी भारत की सरहदों पर चीनी सेनाएं हमला करने में सफल हुईं। इसीलिए ‘तिब्बत की आजादी और भारत की सुरक्षा’ के बीच एक ही सिक्के के दो पहलू जैसा संबंध है। असल में, तिब्बत की मुक्ति साधना की सफलता के बाद ही हम अपनी हिमालयी सीमा के बारे में निश्चिंत हो सकते हैं। कुछ लोग कामचलाऊ जानकारी के आधार पर 1959 में तिब्बत के धर्मगुरू और राष्ट्र प्रमुख दलाई लामा के ल्हासा छोड़कर भारत में शरण लेने के बाद से आज तक कई बार तिब्बत समस्या के अप्रासंगिक होने का दावा करते आए हैं, लेकिन हर कुछ बरस के बाद तिब्बत के स्वतंत्रता सेनानियों की आत्माहुति की लौ इतनी तेज हो जाती है कि इसकी अनदेखी करना असंभव हो जाता है। चीन के भक्तों व वकीलों के लिए तिब्बत की स्वतंत्रता कुल मिलाकर दलाई लामा के अंध अनु& |